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Friday, 5 December 2025

हम सबकी कहानी

ज़िन्दगी से लम्हें चुरा कर
बटुए में रखती रही
फुरसत से खरचूंजी, बस यही सोचती रही
उधड़ती रही जेब, करती रही तुरपाई
फिसलती रही खुशियाँ,करती रही भरपाई।

साल पे साल बीतते रहे
ज़िम्मेदारीयां उठाती रही
कभी बेटी, कभी बीवी, कभी बहु
और फिर माँ, उफ़ तक न की
ख़ुशी ख़ुशी सभी रिश्ते
निभाती रही

इक दिन फुरसत मैंने पाई
तो सोचा .......
खुद को आज रिझाऊं
कुछ इत्राऊँ, कुछ बल खाऊँ
बरसों से जो जोड़े हुए थे
वो लम्हें आज खर्च कर आऊं।

खोला बटुआ. ये क्या, लम्हें तो न थे
मेरा दिल धक रह गया
जाने कहाँ बीत गए, मैंने तो खर्चे नहीं
जाने कहाँ चले गए
ढूंढती रही वो लम्हे
खोजती रही वो बीते पल छिन
लेकिन कहाँ मिलतें हैं यारोँ
जो बीते गया वो दिन

फिर मैंने सोचा, चलो दोस्तों को मिल आऊँ
मिलने गयी तो वो दोस्त वैसे ही न रहे, जैसे थे
किसी की कमर झुकी तो
किसी के घुटने गए थे
आँखों पे सबके लगा था चश्मा
बालों में सफेद चाँदी चढ़ी थी।

मैं हैरान थी कि ये मेरे दोस्त ऐसे तो न थे
वो खुशनुमा बचपन, वो अल्हड़ जवानी, कहाँ गयी
मैं सोचती रही। इतने में आ गयी अब मेरी बारी

मैं तो अभी जवान हूँ, सोचा चलो खुद से मिल आऊँ
आईने में देखा तो पहचान ही न पाई
थी तो मुझ जैसी कोई
पर न जाने कौन खड़ी थी।
मुँह पे झुरियाँ, आँखों पे चश्मा
दातों में भी कुछ कमी सी लग रही थी
मैं तो हरगिज़ नहीं थी, मैं तो बिल्कुल नहीं थी
ये जाने कौन खड़ी थी, ये जाने कौन खड़ी थी। 

गोलमाल है हर शब्द गोलमाल है

गोलमाल है हर शब्द गोलमाल है
सीधे शब्दों की ये टेढ़ी चाल है - २
गोलमाल है हर शब्द गोलमाल है।

यह शब्दों का ही जादू है, जो सिर चढ चढ़ के बोले
यह शब्द ही हैं जो जीवन में विष या अमृत घोले।

शब्द संभाले बोलिये, शब्दों में मान अपमान
कुछ शब्द सीना चीर दें, कुछ घावों पे मरहम समान।

अब देखिये शब्दों की माया
शब्दों का जादू  है जो हमको प्रेम पाश में लाये
यही शब्द फिर प्रेमिका को जीवन संगिनी बनाये
ये कैसी विडंम्बना मित्रों
कि फिर इन्ही शब्दों का हेर फेर
पति पत्नी को दूर ले जाए
"कबूल है" विवाह कराये
"तलाक़ तलाक़ तलाक़" से वहीं साथ छूट जाए
ये शब्दों का हो जादू है
जो सिर चढ़ चढ़ के बोले
ये शब्द ही हैं जो जीवन में विष या अमृत घोले

यही शब्द सड़कों पे भी हम सबको खूब लडाए
बड़े बाप की धोन्स दे देकर, दूसरों को धमकाएं,पर
यही शब्द झट से बदले, जब वर्दी सामने आये जाए
कैसे ये एक शेर को भीगी बिली बनाएं।

सास बहु के शब्द अलग हैं, जो कभी न मेल खायें
सारी कायनात भी चाहे, तो इनकी आपस न बन पाए
पर माँ बेटी के बोल हैं प्यारे, मन में मिश्री घोले
प्यारे प्यारे इन शब्दों से ये प्रेम की माला पिरो लें
मैं शब्द हूँ अपनी महिमा तुमको क्या बतलाऊ
मीठा हूँ तो गैर भी अपने
कड़वा हूँ तो अपनो को दूर भगाऊँ।

पति पत्नी की तो बात अलग है
काम पढ़े तो अमृत की बहार
काम निकले तीरों की बौछार
खंजर, चाकू, कटार, सब रह जाएँ धरे
ऐसी गहरी चोट एक दूजे को दे दें, शब्दों के तीर भरे

मात पिता हो या हो टीचर, सब शब्दों के झोल झाल हैं
बच्चों के सब शब्द फरक हैं, उनकी भाषा बहुत अलग है
किस-किस  से क्या वो बोलें, अपनी समझ से  थलग हैं
उनकी भाषा तो है न्यारी, कभी है प्यारी कभी दुलारी।

प्रशंसा का शृंगार भी शब्द हैं
व्यंग का प्रहार भी शब्द हैं
घुंघरू की झंकार भी यही
शत्रु की ललकार भी यही

अब आती है Gen Z की बारी
जिनकी है भाई भाषा निराली
बात करें पर मुँह न खोलें
Emojis  से ही सब कुछ बोलें
नित नई इमोजी बनती जाती
हमको तो यारों कुछ समझ न आती।

इंसानो के पास है इन शब्दों का भंडार
कभी कभी ये ऐसे निकले जैसे जल की फुहार
और कभी ये रुक से जाएँ, जब चला जाए कोई उस पार
उसी के शब्द है आते याद, हर दिन और हर रात।
आज हमने भी लिखे हैं ये शब्द आधे अधूरे से
किसी की याद में जो निकले हैं पूरे दिल से।

बिछड़े तुम कुछ इस अदा से की रुत बदल गयी
इक तुम सारे शहर को वीरान कर गयी।
जिंदगी का काम है चलना, चलती रहेगी
पर तुम्हारी कमी हमें हर दिन हर पल चुभती रहेगी।
सालों साल तक खटकती  रहेगी - २