इंसानियत अब फ्लोर के हिसाब से बट गयी है
उपर वालों के furniture की आहट, नीचे वाले की जान की आफत बन गयी है।
"ऊँची है बिल्डिंग, लिफ्ट मेरी बंद है" गाना भी अब सच लगता है, बीसवें माले पर चढ़ा हुआ बंदा भी अब नीचे उतरने के ख्याल से डरने लगता है।
पहली समस्या तो ये लिफ्ट की वफादारी है
जब सबसे ज्यादा ज़रूरत है,इसकी मुरम्मत जारी है
और लिफ्ट के अंंदर, पड़ोसी से आँख मिलते ही
उंगलियाँ फोन पे चलने लगती हैं
भले ही अंदर ही अंदर बात करने की इच्छा पनपने लगती है
बालकनी में कपड़े सुखाना भी भैय्या एक talent है
उपर से गिरते कपड़े नीचे वालों के जी का जंजाल हैं
अगर उपर वालों ने गमलों में पानी ज्यादा डाल दिया
यां बाई ने धुलाई कर दी तो समझो नीचे वालों की बालकनी
में swimming pool बन गया।
पार्किंग का scene तो किसी युध् से कम नहीं
दूसरे की जगह अपनी गाड़ी खड़ी करने में सुख भी कम नहीं
"ये मेरा कोना, वो तुम्हारा पिलर है" की बहस पुरानी है
सोसाइटी की हर मीटिंग में भी इसी बात की तो खींचा तानी है।
हवा भी अब खिड़कियों से "Visa" ले कर आती है
और धूप तो सिर्फ दर्शन दे कर चली जाती है
धूप लेने सब ग्राउंड फ्लोर, सेंट्रल पार्क में जाते हैं
और दुनिया भर की बातें बतियाते हैं
Politics की कहानी हो या किटी की दास्तां
इस महँगाई के ज़माने में मचलते अरमाँ
सब मिलता है जी यहाँ।
Delivery बॉय को एड्रेस समझाने में शाम हो जाती है
भैया gate ना. २ से D टॉवर् के सातवें floor पे आ जाओ
यही कहानी चलती रहती है। और जिनको नहीं बुलाया उनके लिए भी N B H से approval की घंटियाँ बजती रहती हैं।
सोसाइटी के मन्दिर की बात ही निराली है, यहाँ आकर मांगता हर कोई अपने लिए खुशहाली है। चंद सिक्के भगवान् को चढ़ा कर, मांग लतें हैं सारे जहान की खुशियाँ बदले में, यहाँ आकर।
जिंदगी अब concrete के इस ऊँचे ढेर में सिमट गयी है
आसमान के तो करीब आ गए पर जमीन से दूरी बढ़ गयी है
हँसता है फिर भी हर इंसान यहाँ, क्योंकि EMI का मारा है
ये स्वर्ग का झूला ही अब हम सबका सहारा है।